मन अधर में मेरा चंचल सा
जीवन मेरा पतझड़ के मौसम सा
दोंनो का कोई मेल नहीं
फिर भी ज़िद मेरा बसंत के फूलो सा
हर बार पतझड़ आएँगे और
हर बार मैं नीचे को गिर जाऊँगी
मैं शाश्वत नहीं हूँ
लेकिन मेरे अंतर्मन में अपनी जड़े फैला चुका वो प्रेम शाश्वत हैं
मेरा विश्वास और कान्हा का प्रेम मेरे जीवन का आधार है
नादान थी मैं जो भटक रही थी हर पल
नादान थी मैं
जो प्रेम का अर्थ जाने बिना उस के मोह में कैद हो रही थी मैं
मैं कोई राधा नहीं और ना यहाँ कोई कृष्ण हैं
फिर भी प्रेम के मूल्यों को समझना चाहती हूँ
कृष्ण के उस प्रेम को जीना चाहती हूँ
जिसकी एक ही परिभाषा थी
प्रेम वही जो स्वतन्त्रता का अहसास दिलाए
प्रेम वही जो हर पल जीने की राह दिखाए
मेरा विचलित मन हर पल बस उस प्रेम को जीना चाहे
राधे कृष्णा
जीवन मेरा पतझड़ के मौसम सा
दोंनो का कोई मेल नहीं
फिर भी ज़िद मेरा बसंत के फूलो सा
हर बार पतझड़ आएँगे और
हर बार मैं नीचे को गिर जाऊँगी
मैं शाश्वत नहीं हूँ
लेकिन मेरे अंतर्मन में अपनी जड़े फैला चुका वो प्रेम शाश्वत हैं
मेरा विश्वास और कान्हा का प्रेम मेरे जीवन का आधार है
नादान थी मैं जो भटक रही थी हर पल
नादान थी मैं
जो प्रेम का अर्थ जाने बिना उस के मोह में कैद हो रही थी मैं
मैं कोई राधा नहीं और ना यहाँ कोई कृष्ण हैं
फिर भी प्रेम के मूल्यों को समझना चाहती हूँ
कृष्ण के उस प्रेम को जीना चाहती हूँ
जिसकी एक ही परिभाषा थी
प्रेम वही जो स्वतन्त्रता का अहसास दिलाए
प्रेम वही जो हर पल जीने की राह दिखाए
मेरा विचलित मन हर पल बस उस प्रेम को जीना चाहे
राधे कृष्णा
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