Friday, 29 August 2014

28 AUG,2004- याद है मुझे वो दिन

वो दिन आज भी मुझे याद है....... नैनों में एक ख्वाब को छिपाए.........अपने घरों से हम उस जहां के लिए निकल पड़े थे....... जिसका ना कोई आदि था ना अंत था..........पता था तो सिर्फ इतना ये है वो जरिया....जो मेरी मंजिल तक जाएगा....वो जिम्सी ही तो था..........जहां सिर्फ ख्वाब जा रहे थे........ और हर ख्वाब अपने में निराला..........सबकी पहचान अलग थी......ज़रूरते अलग थी.....उनको एक करती थी सिर्फ वो मंज़िल जो सबकी एक थी...........मुस्कुराता है दिल उस अहसास से ही सब खुद को धुरंधर समझते थे......कोई ग्यान का भंडार तो.....कोई बला की ख़ूबसूरत.........लेकिन सब हवा हो जाता......... जब चश्में के अंदर से किसी की चमकती हुई निगाहें उस पर पड़ती...........नहीं भूले हम वो गिटिर- पिटीर वाली इंग्लिश वो ख़ूबसूरत में नुक्ता लगाना वो 45 मिनट में रिपोर्टिंग को समझना..........वो राष्ट्रपति के घर का आलू बनने की कवायद....उफ ख्वाब तो चले अपने मंजिल की तरफ लेकिन रास्ते में ही हकीकत से रूबरू होना.....उलझन है दिल के अंदर क्या कहूं जिम्सी ने हमें मंजिल तक पहुंचाया...........या ज़िंदगी के कड़वे हकीकत से रूबरू कराया........ मेरी नज़र से जिम्सी ने ज़िदंगी को समझने का एक नया नज़रिया दिया........ अंजाने शहर में ऐसे दोस्त दिए जो आदत में शामिल हो गए..........और आज देखो दस साल बाद भी सब एक दूसरे को यू हीं बयां कर रहे हो जैसे कल की बात है.......

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