Sunday, 10 August 2014

अपराजिता

  वो जीना चाहती थी..
 खुद के बनाए रास्ते पर चलना चाहती थी....
 अपनी तकदीर को उसने खुद तराशा था.....
 सपने को हकीकत से मिलाया था.....
 उसे दिल के हर अरमान को पूरा करना था.....
 ना जाने कितने दिलों की आस थी वो......
 अपने परिवार का गुरूर थी वो.....
 लेकिन किसे पता था...
 वक्त ने उसके लिए क्या सोचा था....
 चेहरे पर तेज, दिल में जज्बा..
 अपने खुशियों का हाथ थामें....
 वो चली जा रही थी......
 किसे पता था...
 कि ये उसके आखिरी  कदम है...
 किसे पता था कि उसके अरमान दम तोड़ने वाले है....
 किसे पता था उसका नारी होना ही उसकी सजा बन जाएगी.........
 वो बिलखती रही.....
 वो चिखती रही......
 लेकिन किसी ने नहीं सुना उसकी पुकार...
 उसकी आत्मा रोती रही..
 अस्मिता लूटती रही..
 लेकिन इस युग में कोई कृष्ण नहीं आये.....
 भगवान भी कलयुग का हवाला देकर मौन रहे......
 इतना दर्द तो द्रौपदी को भी नहीं हुआ था.....
 लेकिन उसका साथ कृष्ण ने दिया.....
 फिर आज क्यों नहीं कोई कृष्ण आये...
 हंसी आती है.....
 जब लोग कहते है कि उसे विरोध नहीं करना था....
 हंसी आती है.....
 जब लोग कहते है उसे भगवान का नाम लेना था....
 हंसी आती है....
 जब लोग कहते है उसे उनको भाई बना लेना था...
 ना कृष्ण आये...
 ना कोई भाई बना.....
 ना किसी ने भगवान को माना.....
 वो लड़ती रही अंत समय तक लड़ती रही.....
 खुद तो चली गई लेकिन....
 हर नारी के अंदर छिपे दर्द को कुरेद गयी....
 मर्दानगी का दम भरने वाले समाज को आइना दिखा गई.......
 अंधेरे कमरों में सिसकती आवाज को विरोध करना सिखा दिया.......
 खुद के साथ बेनाम लेकिन गहरा रिश्ता बना गई.....
 क्या थी उसकी पहचान कोई नहीं जानता......
 लेकिन वो अपराजिता थी.........................      

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