गुम
सी हो गई है पहचान मेरी.....
अब
तो ख़्वाब में भी किरदार नज़र आते हैं....
कभी
झूठी हँसी तो कभी झूठे तकल्लुफ़ यूँ ही मेरा अक्स बन जाते है....
हम
अपना किरदार यूँ ही रंगमंच पर निभाते हैं....
वक़्त
गुज़र जाता है इस ख़्याल में.....
ऐसा
क्या कहूँ जो मुनासिब लगे उसे.....
बस
वही कहते जाते है.....
ज़िंदगी
एक ऐसा रंगमंच है.......
जहाँ
कलाकारों से ज्यादा......
किरदारों
को तवज्जो दी जाती है......
ख़ुद
के दिल की गहराइयों में ही अपनी पहचान उलझ कर रह जाती है......
कितना
आसान होता ये सफ़र .......
जब
सच से सच कह कर उसे खोने का डर ना होता.........
अपनी
ही पहचान को किरदारों का गुलाम ना बनाना होता.....
काश
बेफ़िक्र सा होता वजूद मेरा.......
यूँ
ही किसी किरदार के हाथ का कठपुतली
ना
होता..........
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