Wednesday, 30 July 2014
उलझे हुए रिश्तें
उलझे हुए रिश्तो को सवार सके कोई..........
मीठी यादों को नज़रों के सामने ला सके कोई ......
गुम हो रहा इंसान खुद की जरूरत में.....
दो पल का सुकून दिला सकें कोई........
कभी वक्त वो भी था जब दिल किसी के लिए धड़कता था.......
अपनी चाहत से मिलने का अरमान जगता था......
रिश्तें को गहरा बनाने का ख्वाब सजता था......
लेकिन हाय रे इंसान की जरूरत......
पैंसो ने ले ली रिश्तों की जगह.....
अब ना ख्वाब सजते है....
ना अरमान जगते है......
ना निगाहें किसी अपने को खोजती है.......
नज़र होती है तो सिर्फ पैसों पर.....
उलझा हुआ है मन इस सवाल से......
पैसा अनमोल या रिश्ता अनमोल....
अच्छा है कुदरत के रंग बिकते नहीं बाज़ारों में.....
वर्ना बेरंग हो जाती तूलिका अपनी ही दुनियां में.....
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