Wednesday, 23 July 2014

कहां है मेरा वजूद

अपने वजूद को तलाशती नारी...... रिश्तो के जाल में अपनी ही पहचान को भूलती नारी..... कभी यहां तो कभी वहां..... मर्यादा के नाम पर बली चढ़ती नारी..... भूखी नजरों का शिकार बनती नारी..... अपने दिल की सुने तो बदनामी.... औरो की सुने तो बेचारी.... आखिर कब तक सहेगी नारी..... देख नारी की दुर्दशा.... सोचती हूं इन्सान की संवेदना जिस कदर गायब हो रही है ........... ऐसे ही रंग गायब हो गए तो कैनवास पर कैसे रंग बिखेरेगी तूलिका.....

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