Wednesday, 23 July 2014

सिसकता बचपन

गुमसुम सा उदास था वो पल..... खामोश जुबां बंया करना चाहती थी अपना दर्द.... लेकिन दिल में छुपा था एक डर..... कौन सुनेगा मेरी बात ..... कौन समझेगा मेरे जज़बात ..... तीखी नजरों से खुद को छुपाउं कहां...... उस गंदे अहसास से बच के जाउं कहां...... कौन जानेगा इस मासूम से दिल का दर्द .... कहने को तो सब थे आसपास.... लेकिन दिल फिर भी था उदास..... बचपन बिखर रहा था...... मासूम दिल सवाल पूछ रहा था.. किसके साये में खुद को करू महफूज़...... क्यों हो रहा है ये सब मेरे साथ...... मां से कहूं तो पूछेगी वो ढेरो बात....... पिता से कहूं तो सुनने को मिलेगी मुझे डांट... डर के साये में सिसकता रहा इस कदर बचपन .... कि भूल गया वो अपनी पहचान......

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