Sunday, 10 August 2014
अधूरी यादें
मासूम बचपन.....
हर छोटी सी बात पर मां से रूठ जाना....
मां के दुलार पर खुद ब खुद मान जाना...
पापा के कंधे पर बैठकर खुद को बड़ा समझना.....
तोतली जबान में कुछ भी मांग लेना.....
पंछी की तरह आसमां में उड़ने की चाह रखना....
अपनी जरूरत को थोड़े में समेटने का गम.....
पड़ोसी के खिलौने को नजर भर कर देखने की चाहत........
धुंधला सा दिखाई देता है वो लम्हा......
वो आधी अधूरी यादें बरबस ही सपने का हिस्सा बन जाती है........
कभी आखों से आसू बहने लगते है.....
तो कभी ऐसे ही हंसी आ जाती है......
ये अधूरी यादे दिल का अहम हिस्सा है.....
दिमाग इन्हें कभी भूलना नहीं चाहता.....
दिल इनसे दूर जाना नहीं चाहता......
और वक्त कम्बख्त इन्हें हमारे पास रहने नहीं देता.................
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4 comments:
bahut badiya :)
Thanks ajay
waqut to chala jata hai yaade hamresa saath hote hai......... nice .......... touching
Thanks manoj
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